ये मन क्यों उलझ रहा है?

ये मन सोच रहा है, क्या सबकुछ बदल गया है, या

सबकुछ बदल रहा है, अगर ये नहीं बदल रहा है

तो ये मन ही है, खुद में खुद उलझ रहा है,

मन खुद सोचता है, देखता है उन बीते हुए लम्हों को,

उसे यकीन है कि कुछ हो रहा है,

पर ये जिद्दी है, थोड़ा नादान भी है,

फिर भी ये सोच रहा है कि क्या है जो बदल रहा है,

वो खुद से उलझ रहा है,

बच्चा सा है मन उसे बहला दो, अगर बड़ा भी है मन तो क्या हर्ज है,

उसे फिर बच्चा बना दो,

ज़िन्दगी के कशमकश में, इस मन को बेबस न बनाओ,

ये मन तुम्हारा है तुम उसे समझाओ,

इस मन को तुम ताकत बनाओ,

जीने की हर आश जगाओ,

मन के बाहर तो बस निर्जीव तन है,

ये मन उस ईश्वर का दर्पण है।।

12 thoughts on “ये मन क्यों उलझ रहा है?

  1. Youth have more questions about life because hormones are in constant motion. Everything is questioned because part inherentre to the person not accepting for accepting how the changes in our personality come. The mind is the reflection of our interior. I like how you focus your verses on how you feel. It is a very clear poem and typical of your age.
    My greetings
    Manuel

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